Thursday, January 22, 2015

लुल हैं ये यूएन वाले भी.…

हम जम्बूद्वीप वासियों को हर चीज़ में नंबर वन कहलाने का शौक है। कई मामलों में में हम हैं भी नंबर वन। इन्हीं में से एक है मैटरनल मोर्टेलिटी रेट, जो कि यूएन के आंकड़ों के अनुसार 19 प्रतिशत है। यानी हर साल हमारे यहाँ 56000 औरतों  की मौत बच्चे को जन्म देते समय या इसके 49 दिनों के अंदर  हो जाती है। नाइजीरिया में यह आंकड़ा 40000, पाकिस्तान में 12000 और अफ़ग़ानिस्तान में 6400 है। इस लिस्ट में चीन 22 वें और अमेरिका 60 वें नंबर पर है। अगर आपने कभी सरकारी अस्पताल के मैटरनिटी वार्ड में एकाध घंटा बिताया है तो आपको अंदाजा होगा कि ऐसा क्यों है। और घर पर प्रसव कराने की परंपरा भी तो कई गावों में चल रही है। तिस पर भी अगर साक्षी महाराज, साध्वी प्राची, श्यामल गोस्वामी, शंकराचार्य वासुदेवानंद सरस्वती और चंद्रबाबू नायडू की 5-10 बच्चों के प्रोडक्शन वाली सलाह (?) को सीरियसली लिया गया, तब तो यह आंकड़ा सारे रिकॉर्ड ही तोड़ देगा। फिर तो शायद नंबर वन से भी बड़ी पोज़ीशन का आविष्कार करना पड़ जाए। लुल हैं ये ये यूएन वाले भी। पता नहीं काहे औरतों को इंसानों की श्रेणी में रख कर ये डेटा-उूटा निकालते रहते हैं। टैम के हिसाब से अपडेट हो जाना चाहिए। कहे नहीं डब्लू डब्लू एफ वालों को यह काम सौंप देते हैं । टाइगर की तरह औरतों के लिए भी बनवा दीजिये कुछेक नेशनल पार्क। जितनी चाहे ब्रीडिंग कराइये। 10 क्या, 20-30 बच्चे भी पैदा हो जाएंगे। फिर बजट की कमी पड़े तो 'सेव टाइगर एंड वीमेन ' अभियान चलाते रहिएगा।                     

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