एक थी चिड़िया। नन्हीं सी। मासूम सी। पंख उसके खाकी थे लेकिन आंखों के सपने सतरंगी थे। तमाम जज्बातों और अरमानों वाले ये रंग कितने चटख थे। मानों कह रहे हों,'होली का इंतजार हमसे न हो पाएगा। हमें तो बस अभी बरसना है।' पहली बारिश की तरह। चिड़िया को आसमान में पंख पसार कर उड़ना बहुत लुभाता था। हर दिन दाना-चुग्गा तलाशने दूर निकल जाती थी। अपने अस्तित्व पर बडा गुमान था उसे। एक दिन उसे एक घर की मुंडेर पर किसी ने दाना चुगने को दिया। उस दिन उसे भटकना नहीं पड़ा। अगले दिन वह वहां से गुजरी तो उसे फिर मुंडेर पर दाना मिल गया। चिड़िया की आंखें चमक उठीं। 'कितने दयालु हैं इस घ्ार के लोग। मेरी कितनी मेहतन बचा ली।' फिर तो यह रोज का नियम बन गया। चिड़िया उस घ्ार के दानों पर पलने लगी। एक रोज वह वहां पहुंची तो दाने नहीं थे। दरवाजे पर एक बडा सा ताला जड़ा हुआ था। जड़वत सी हो गई वह। सोचा, चलो आज खुद ही दाने की तलाश में निकल जाती हूं। लेकिन उसका यह ख़याल ख़याल ही रहा। उड़ न सकी वह। वहीं बैठी रही। वहां रखे मिट्टी के बर्तन में रखा पानी पिया और फुदक कर दूसरी जगह बैठने ही वाली थी कि उसे पानी में अपना प्रतिबिंब नज़र आया। खुद को पहचान नहीं पाई वो। खाकी पंख बेरौनक हो चले थे। जैसे किसी ने उनके रेशे उधेड़ दिए हों। आंखें पत्थर हो गई थीं। चोंच भी पहले की तरह पैनी नहीं रही थी। वहां से गुजरते कुछ बच्चों ने उसे उसकी हिम्मत और काबिलीयत की याद दिलाने की कोशिश की। चिड़िया उड़। चिड़िया उड़। चिड़िया उड़। उन्होंने पूरी शक्ति लगाकर कई बार कहा पर चिड़िया नहीं उड़ी। उसका खुद पर से विश्वास उठ गया था। उस मुंडेर पर उसके पैर ऐसे जम गए थे मानों किसी बिहेलिये ने चतुराई से जाल बिछाकर उसे फांस लिया हो। जबकि ऐसा कुछ नहीं था। जाल की कल्पना उसकी खुद की थी। आज ऐसी बहुत सी स्त्रियां हैं जो इस चिड़िया की तरह यह मान बैठी हैं कि उनके पैर किसी अदश्य जाल से बंधे हुए हैं। फेंका हुआ दाना खाने के सिवा उनके पास कोई चारा नहीं है। पर सवाल यह है कि क्या हकीकत में ऐसा है? उत्तर भारतीय घरों में 'चिड़िया उड़' नामक एक खेल खेला जाता है। क्यों न इसे वयस्कों की दुनिया में भी जगह दी जाए! अदश्य जाल का डर दिखाने के बजाए चिड़िया के पंखों को परवाज दी जाए.… Tuesday, November 18, 2014
एक थी चिड़िया.…
एक थी चिड़िया। नन्हीं सी। मासूम सी। पंख उसके खाकी थे लेकिन आंखों के सपने सतरंगी थे। तमाम जज्बातों और अरमानों वाले ये रंग कितने चटख थे। मानों कह रहे हों,'होली का इंतजार हमसे न हो पाएगा। हमें तो बस अभी बरसना है।' पहली बारिश की तरह। चिड़िया को आसमान में पंख पसार कर उड़ना बहुत लुभाता था। हर दिन दाना-चुग्गा तलाशने दूर निकल जाती थी। अपने अस्तित्व पर बडा गुमान था उसे। एक दिन उसे एक घर की मुंडेर पर किसी ने दाना चुगने को दिया। उस दिन उसे भटकना नहीं पड़ा। अगले दिन वह वहां से गुजरी तो उसे फिर मुंडेर पर दाना मिल गया। चिड़िया की आंखें चमक उठीं। 'कितने दयालु हैं इस घ्ार के लोग। मेरी कितनी मेहतन बचा ली।' फिर तो यह रोज का नियम बन गया। चिड़िया उस घ्ार के दानों पर पलने लगी। एक रोज वह वहां पहुंची तो दाने नहीं थे। दरवाजे पर एक बडा सा ताला जड़ा हुआ था। जड़वत सी हो गई वह। सोचा, चलो आज खुद ही दाने की तलाश में निकल जाती हूं। लेकिन उसका यह ख़याल ख़याल ही रहा। उड़ न सकी वह। वहीं बैठी रही। वहां रखे मिट्टी के बर्तन में रखा पानी पिया और फुदक कर दूसरी जगह बैठने ही वाली थी कि उसे पानी में अपना प्रतिबिंब नज़र आया। खुद को पहचान नहीं पाई वो। खाकी पंख बेरौनक हो चले थे। जैसे किसी ने उनके रेशे उधेड़ दिए हों। आंखें पत्थर हो गई थीं। चोंच भी पहले की तरह पैनी नहीं रही थी। वहां से गुजरते कुछ बच्चों ने उसे उसकी हिम्मत और काबिलीयत की याद दिलाने की कोशिश की। चिड़िया उड़। चिड़िया उड़। चिड़िया उड़। उन्होंने पूरी शक्ति लगाकर कई बार कहा पर चिड़िया नहीं उड़ी। उसका खुद पर से विश्वास उठ गया था। उस मुंडेर पर उसके पैर ऐसे जम गए थे मानों किसी बिहेलिये ने चतुराई से जाल बिछाकर उसे फांस लिया हो। जबकि ऐसा कुछ नहीं था। जाल की कल्पना उसकी खुद की थी। आज ऐसी बहुत सी स्त्रियां हैं जो इस चिड़िया की तरह यह मान बैठी हैं कि उनके पैर किसी अदश्य जाल से बंधे हुए हैं। फेंका हुआ दाना खाने के सिवा उनके पास कोई चारा नहीं है। पर सवाल यह है कि क्या हकीकत में ऐसा है? उत्तर भारतीय घरों में 'चिड़िया उड़' नामक एक खेल खेला जाता है। क्यों न इसे वयस्कों की दुनिया में भी जगह दी जाए! अदश्य जाल का डर दिखाने के बजाए चिड़िया के पंखों को परवाज दी जाए.…
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चलो चिड़िया की तरह तुम्हारी परवाज़ भी बरक़रार रहे.....इंशा अल्लाह तुम हमेशा अपने पंखों को फैलाकर शब्दों की दुनिया में यूं ही कुलांचे भरती रहो, शुभकामनाएं और स्वागत ब्लॉग में...।
ReplyDeleteधन्यवाद इन्दु मैम।
Deleteस्वागतेय
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